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जय श्री हनुमानजी : कहा जाता है कि हनुमान जी को धर्म की रक्षा के लिये अमरता का वरदान प्राप्त है।

Ed.Sourabh Dwivedi

Thu, Apr 2, 2026

वे धर्म रक्षार्थ कलयुग में भी जागृत हैं। पवनसुत बचपन से ही अत्यंत बलशाली थे। वे बाल्यकाल में सूर्य को फल समझ उसे खा बैठे थे। जिसके चलते क्रोधित इंद्र ने उनकी हनु (ठोढ़ी) पर वज्र से हमला कर मूर्छित कर दिया था। इससे आहत होकर पवन देवता ने समस्त ब्रम्हांड में वायु के वेग रोक दिया था जिससे सृष्टि में हाहाकार मच गया था। तब समस्त देवताओं ने पवनसुत को अपनी अलौकिक विद्याएं देकर उन्हें सर्व शक्तिमान बनाया था और तब से पवनसुत, हनुमान हुए। हनुमान जी का सम्पूर्ण जीवन वानरराज सुग्रीव और प्रभुश्रीराम की सेवा में बीता। वीर बजरंगी चाहते तो वे सुग्रीव और श्रीराम के काम क्षण भर में कर देते। लेकिन वे अपनी उपस्थिति से उन दोनों के काम सुगम करते रहे और कभी माध्यम बन तो कभी दूत बन।

मेरा कहने का आशय यह है कि हमारे हनुमान कलयुग में धर्म रक्षार्थ उपस्थित हैं। लेकिन धर्म की रक्षा के लिये हम सबको स्वयं बलिष्ठ और शक्तिशाली बनना होगा। फ्लेक्स और फ्लैग, भजन और भंडारा, डीजे और तोरण के साथ ही साथ स्वयं को और समस्त हिन्दू समाज को आत्मरक्षार्थ साधन संपन्न और सर्वशक्तिमान बनाना पड़ेगा। ये सतयुग नहीं कलयुग है। अतः आलौकिक शक्तियों के भरोसे न रहें। कूटनीति और रणनीति के साथ काम कर हनुमानजी को साक्षी मान शक्तिशाली बनें। हनुमानजी का भक्त निर्बल हो, शक्तिहीन हो, पराक्रमहीन हो, कायर हो, ये संभव नहीं। भजन-भंडारे और कर्मकांड के साथ ही साथ स्वयं और हिन्दू समाज को शक्तिशाली बना हनुमान जी सच्ची भेंट अर्पित करें।

याद है न देश के कई हिस्सों में होली, रामनवमी, दशहरा और अन्य शोभायात्राओं के दौरान हिंदुओं पर हिंसक हमले होते हैं। कुछ हिंदू इन आतताईयों से संघर्ष करते हैं तो कुछ अपना मकान बेचकर आदतानुसार पलायन कर जाते हैं। कहाँ तक भागोगे...?

कश्मीर, कैराना, खरगोन, सुराना...

कायरों को कहीं जगह नहीं मिलती।

ध्यान रखिये, "वीर भोग्या वसुंधरा..."

स्मरण रहे बाबा तुलसीदास जी हनुमान जी के परम उपासक थे। भारतीय जनमानस को हष्ट-पुष्ट करने अखाड़ों की जो संस्कृति प्रारंभ हुई थी वो रामायण रचियता तुलसीदास जी ने ही प्रारंभ करवाई थी। तुलसीदास जी ने बताया था कि अखाड़े शुरू करने की प्रेरणा और आदेश उन्हें हनुमान जी से मिला था। पुराने ज़माने में हिंदू जुलूसों के आगे अखाड़े क्यों चलते थे..? अब समझ में आया।

अतः हनुमानजी के प्राकट्य उत्सव पर्व के अवसर पर वीरता को धारण कर स्वयं को शक्तिशाली बनाने का प्रण लें।

जय वीर बजरंगी

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